Sunday, January 22, 2012

रुश्दी के प्रति

मैं आहत होता हूं,

तुम परवा नही़ं करते ।

ये कैसी दिल्ली है,

उसे सूली नही़ं चढ़ाती ।।



मेरी दाढी में अभी,

जू जैसा रेंगा है ।

यह दकियानूसी है ।

यह साजिश भारी है ।।



शैतानों के जैसा,

मोटी किताब लिखता ।

मारो - मारो उसको,

वह आँख दिखाता है ।।



साहिब तुमहीं देखो,

भाई तुमहीं देखो,

अल्ला तुमहीं देखो,

वह नाक चिढ़ाता है ।।



बाबू देखो मुझको,

उँगली दिखलाता है ।

कागद - कलम लेकर,

किताबें लिखता है ।।


rajeev3007@gmail.com