मैं आहत होता हूं,
तुम परवा नही़ं करते ।
ये कैसी दिल्ली है,
उसे सूली नही़ं चढ़ाती ।।
मेरी दाढी में अभी,
जू जैसा रेंगा है ।
यह दकियानूसी है ।
यह साजिश भारी है ।।
शैतानों के जैसा,
मोटी किताब लिखता ।
मारो - मारो उसको,
वह आँख दिखाता है ।।
साहिब तुमहीं देखो,
भाई तुमहीं देखो,
अल्ला तुमहीं देखो,
वह नाक चिढ़ाता है ।।
बाबू देखो मुझको,
उँगली दिखलाता है ।
कागद - कलम लेकर,
किताबें लिखता है ।।
rajeev3007@gmail.com
तुम परवा नही़ं करते ।
ये कैसी दिल्ली है,
उसे सूली नही़ं चढ़ाती ।।
मेरी दाढी में अभी,
जू जैसा रेंगा है ।
यह दकियानूसी है ।
यह साजिश भारी है ।।
शैतानों के जैसा,
मोटी किताब लिखता ।
मारो - मारो उसको,
वह आँख दिखाता है ।।
साहिब तुमहीं देखो,
भाई तुमहीं देखो,
अल्ला तुमहीं देखो,
वह नाक चिढ़ाता है ।।
बाबू देखो मुझको,
उँगली दिखलाता है ।
कागद - कलम लेकर,
किताबें लिखता है ।।
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