Friday, April 11, 2014

क्या हार ! क्या जीत !



हार, 

खाती रही इस कदर
 
गोया धुन
 
कि कभी उठ भी सका जीतने को
 
तिस पर तेरी नादानी,
 
कि उठ - उठ लरूँ बार - बार
 
कि हार - जीत हीं,
 
कुदरत का रंग हो

 मेरा वजूद हो

 तेरा ईमान हो

साँस का संबल भी नहीं रहता जिस दिन

आस बेआस हो जाती जिस दिन

खोने और खोजने में धुंधिया जाती आखें जिस दिन

क्या हार क्या जीत उस दिन ?

आदमी मिट जाता है धीरे धीरे

सो,

हार

खाती रहती इस कदर,
 
गोया धुन