हार,
खाती रही इस कदर
गोया धुन ।
कि कभी उठ
भी न सका
जीतने को ।
तिस पर तेरी
नादानी,
कि उठ - उठ
लरूँ बार - बार ।
कि हार - जीत हीं,
कुदरत का रंग
हो ।
मेरा वजूद
हो ।
तेरा ईमान हो ।
साँस का संबल भी नहीं
रहता जिस दिन ।
आस बेआस हो जाती जिस
दिन ।
खोने और खोजने में
धुंधिया जाती आखें जिस दिन ।
क्या हार क्या जीत
उस दिन ?
आदमी मिट जाता है धीरे
धीरे ।
सो,
हार
खाती रहती इस कदर,
गोया धुन ।