Friday, April 11, 2014

क्या हार ! क्या जीत !



हार, 

खाती रही इस कदर
 
गोया धुन
 
कि कभी उठ भी सका जीतने को
 
तिस पर तेरी नादानी,
 
कि उठ - उठ लरूँ बार - बार
 
कि हार - जीत हीं,
 
कुदरत का रंग हो

 मेरा वजूद हो

 तेरा ईमान हो

साँस का संबल भी नहीं रहता जिस दिन

आस बेआस हो जाती जिस दिन

खोने और खोजने में धुंधिया जाती आखें जिस दिन

क्या हार क्या जीत उस दिन ?

आदमी मिट जाता है धीरे धीरे

सो,

हार

खाती रहती इस कदर,
 
गोया धुन
 

Saturday, March 22, 2014

अफ़ग़ानिस्तान: पत्रकार का परिवार समेत क़त्ल

http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/03/140322_afghan_journalist_kabul_hotel_attack_killed_tk.shtml

 
एक गोली,

जो धाँय से चलती है,

चीर देती है सीना,

क्या मारेगी किसी को ?

मारता तो कलमगार है।

कि सर्र्सर्र्,

लब्ज लब्ज,

दिमाग को झकझोर देता है।

और बदल  जाती है पीढियाँ।

कि बंदूक उठाने का जुनून ही

मिट जाता है दिल से।

कैसे मारोगे ?

कितने तो हैं सरदार अहमद।

वो तो अब भी जिंदा है।

हर लब्ज़ में।

हर किताब में।

हर दिमाग में।

हर सीने में।

rajeev3007@gmail.com